तिनसुकिया जिले के तीरप-जागुन क्षेत्र में लाइका निवासियों को फिर से बसाने के सरकारी फैसले के खिलाफ स्थानीय लोग और विभिन्न जातीय संगठन लामबंद हो गए हैं। बुधवार को जागुन के 1 नंबर फानेन में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन के माध्यम से विभिन्न संगठनों के पदाधिकारियों और स्थानीय निवासियों ने सरकार के इस कदम का कड़ा विरोध किया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि पुनर्वास के नाम पर सदियों पुराने आरक्षित वन क्षेत्र को नष्ट करना पर्यावरण और स्थानीय समुदाय के लिए घातक सिद्ध होगा।
संवाददाता सम्मेलन में वक्ताओं ने सरकार और संबंधित विभाग को चेतावनी दी कि तीरप आरक्षित वन (Tirap Reserved Forest) को नष्ट करने की मानसिकता का परित्याग किया जाए। संगठनों ने स्पष्ट किया कि यदि प्रशासन ने उनकी मांगों को अनसुना किया, तो सरकार के खिलाफ तीव्र लोकतांत्रिक और जन आंदोलन छेड़ा जाएगा। क्षेत्र के लोगों का तर्क है कि वे अतीत में भी एक विशेष जनजाति के पुनर्वास का बोझ उठाते आए हैं, लेकिन अब वन संपदा की बलि देकर पुनर्वास स्वीकार्य नहीं है।
दिलचस्प बात यह है कि संगठनों ने लाइका निवासियों के पुनर्वास के सरकारी फैसले का स्वागत तो किया है, लेकिन इसके स्थान को लेकर सवाल उठाए हैं। नेताओं ने प्रश्न किया कि जब असम सरकार ने राज्य के विभिन्न हिस्सों में हजारों बीघा सरकारी भूमि को अवैध अतिक्रमणकारियों से मुक्त कराया है, तो उन स्थानों पर बाढ़ प्रभावित लाइका वासियों को क्यों नहीं बसाया जा रहा है? संगठनों ने सरकार से अपील की है कि आरक्षित वनों को बचाने के लिए बेदखली के बाद खाली हुई जमीनों का उपयोग पुनर्वास के लिए किया जाए।



